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12 मई, 2008


ब्लॉग्स (1)
यह उन दिनों की बात है जब मैं देवानंद की फिल्में देखकर बहुत ही कम उम्र में जासूसी के प्रति आकर्षित हो चला था, जासूसी उपन्यास तो बाद में पढ़े। इसलिए मैं हर शख्स को जासूसी निगाहों से देखता था यह सोचते हुए कि कहीं यह मेरी जासूसी करने के लिए तो नहीं भेजा गया। मैं उसे उपर से नीचे तक सूंघता था। वह जो भी होता था मेरे इस घूरने के... आगे पढ़ें...