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एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी

एक बेदखल की डायरी-3

यह सत्तर के दशक की चर्चित कहानी का टाइटल है....

यह उन दिनों की बात है जब मैं देवानंद की फिल्में देखकर बहुत ही कम उम्र में जासूसी के प्रति आकर्षित हो चला था, जासूसी उपन्यास तो बाद में पढ़े। इसलिए मैं हर शख्स को जासूसी निगाहों से देखता था यह सोचते हुए कि कहीं यह मेरी जासूसी करने के लिए तो नहीं भेजा गया। मैं उसे उपर से नीचे तक सूंघता था। वह जो भी होता था मेरे इस घूरने के प्रति गुस्सा हो जाता था- क्यों रे क्यों घूर रिया है क्या काटेगा, मारेगा।

जासूस प्रवृत्ति और गुस्सेल चरित्र मेरे स्वभाव के हिस्से बन चुके थे। याने देवानंद और अमिताभ दोनों एक साथ मेरे भीतर से चिल्लाते थे जिसकी गुंज पूरी ग्वाड़ी (चाल) में गुंजती थी। मैं बहुत छोटा था लेकिन मुझसे कहीं बड़ी लड़कियों और लड़कों की हरकतों का विश्लेशष करता रहता था। मैं यह भी भाँप लेता था कि किस बच्चे को मीडियेटर बनाया जा रहा है चिठ्ठी आदान-प्रदान करने के लिए।

हमारी ग्वाड़ी में कई किरायेदार होने के कारण कई जिंदगियाँ बसर कर रहीं थी नई-नई कहानियों के साथ। मुझे बहुत बुरा लगता था जब नौजवान लोग मुझसे पतंग का हुचका थामने के लिए कहते थे, लेकिन मजबूरी थी, क्योंकि इसके बदले थोड़ी देर पतंग उड़ाने के लिए मिल जाती थी।

गली में बायस्कोप वाला आता था जिसे देखने के लिए मेरा छोटा भाई मचल जाता था। ओ भिया वो- अँगुली से बताते हुए। चल हट दो बार दिखा दिया वो की वोई फिल्म रेती है। अब तीसरी बार भगवान के सिंघासन के नीचे रखे ये बीस (पितल के) पैसे चोर के लाया हूँ, तीन पहिए वाली साइकिल चलाऊँगा- बेटे समझे। वह भी बहुत जिद्दी था और आज भी है- नी बायस्कोप ही देखुँगा। अरे तेरको देखना है तो तू चोर के ला नी। मेरा भेजा मत खा।... और वह धूल में लोटपोट लगाकर रोने-चिल्लाने लगता था कि आन दे कुत्ते पापा से कुँगा कि तूने पैसे चुराए। उसे मालूम था कि मैं पापा से बहुत डरता था। वह चालाक था। मैं अक्सर सिर्फ उसी के सामने सीधा पढ़ जाता था।

बच्चू खाँ की दूकान पर दो और तीन पहिएँ की छोटी साइकिल मिलती थी 20 पैसे घंटा। पतंग उड़ाना और साइकिल चलाने के अलावा माचिस इकठ्ठी करना, अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र के 5 पैसे में मिलने वाले फोटो इकट्ठे करना मेरा शौक था। सिंधि सर का छोरा आनंद उसके तीन मंजिला मकान था उसी की छत पर से आनंद, अब्दुल मन्नान और मैं तीनों पतंग उड़ाते थे। आस-पास कई कबूतरबाज हुआ करते थे। वहीं पतंग का मांजा सूतते थे। उसके लिए कांच पीसने की मेहनत मन्नान किया करता था। और अक्सर वहीं दूर से ही मेरे भाई को देखकर सतर्क कर दिया करता था।

वह पापा मम्मी से मेरी शिकायत नहीं करता था लेकिन वह अपनी हर इच्छा पापा के बजाय मुझसे पुरी करता था। उसे मिठाई खाने का शौक था। और गुड्डी के बाल और बम्बईयाँ मिठाई के लिए अक्सर मुझे पचाता था। एक दिन दौड़ता हुआ आया भिया कैलाश

काका ने बुलाया है फोटु खिंचेंगे। कैलाश सोनी जाने-माने छायाकार है जिन्हे कई राष्ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय अवार्ड मिल चुके है जिनके चित्रों की प्रदर्शनी अमेरिका की छाया गैलरी में लग चुकी है।

क्या फोटु किसका? मेरा और तेरा? बहुत दिनों बाद फोटु खिंचने का सुनकर मैं भी रोमांचित हो चला था। कैलाश काका हम दोनों भाईयों को छतरी बाग ले गए। काका ये हमारे इत्ते सारे फोटु क्यों खिंच रिये हो?

तू एक काम कर तेरा चेहरा थोड़ा सीधा बना और छतरी की ओर देख, हँसे मत- 'हो काका।' उन्होंने हम दोनों भाइयों के कई फोटो खिंचे। अरे यार ये छोटु अच्छे पोज देता है तू नहीं। जब मैंने कहा कि सामने मत देख साइड में देख। अरे यार काका मेरकु मालूम है तुमने पहले भी ऐसे ही फ्लस चमका के घपलाया था। बाद में पता चला कि मेरे छोटे भाई का फोटो धर्मयुग में छपी कहानी 'एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी' में छप गया।

कहानी इस प्रकार : कस्बे से आकर एक ‍गरीब स्त्री अपने बीमार पति को शहर के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराती है। साथ में उसकी गोद में 5 वर्षिय पुत्र होता है- मम्मी कित्ती चिकनी जमीन है अब हम यहीं रहेंगे। बाप-रे इत्ता बड़ा महल। बच्चा शहर और अस्पताल की भव्यता और चकाचौंध को देखकर खुश हो जाता है।

डॉक्टरों से अपने पति को बचा लेने की याचना करती वह मासूम स्त्री शहरी चकाचौंध से अनजान होती है। डॉक्टरों को उसकी बेबसी को छोड़ उसका फटा ब्लॉऊज ज्यादा आकर्षित करता है। उस पर से उसकी कस्बाई सुंदरता से डॉक्टरों की लार टपकने लगती है।

रात को उसके पति को बचा लने के वादे के साथ जब उसकी मजबूरी लुट ली जाती है, तब उसकी आँखों में आँसू देख उसके पाँच वर्षिय बालक की उत्सुकता और चमक चुप्पी में बदल जाती है। बाद में उसके पति को एक गलत इंजेक्सन लगाकर मार दिया जाता है। वह स्त्री कुच्छ भी नहीं बोल पाती है- पति की लाश के पास अपनी माँ को रोते-बिलखते देख बालक को समझ में नहीं आता की आखिर यह हो

क्या रहा है।....

प्रतिक्रियाएँ

Re: एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी
भाई शतायु, इन तीनों किश्तों को पढ़कर एक बात तो कह ही सकता हूँ कि अगर इन्हें ठीक से लिखो तो यह अज्ञेय जी प्रसिद्ध शेखरः एक जीवनी की याद दिला सकते हैं। अज्ञेय जी मेरे आदर्श हैं और आप भी उन्हें जानते ही होंगे, अतः आप समझ गए होंगे कि मैंने आपको कॉम्प्लीमेंट कितने उच्च दर्जे का दिया है इसलिए इसके आगे भी लिखने की कोशिश करें।
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