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येरुशलम की याद

मेरे सपनों का शहर

मेरे सामने एक बड़ा-सा प्राचीन गेट है, कम से कम तीन हाथी एक पर एक चढ़कर निकल जाएँ। गेट से सटी किले की दीवार जिसके पार न मालूम किसका महल है, लेकिन घोड़ों पर सवार योद्धाओं का उक्त गेट से आना-जाना लगा रहता है। पहले यहाँ किसी कौम का राज नहीं, कबिले हुआ करते थे। फिर कौमें हो गई। कौमों के होने से युद्ध का भयावह दौर चला।

मैं देखता हूँ कि किले की उस बड़ी-सी दीवार पर लिखा है- 'यहोवा का राज्य'। कई दफे मैं सपनों में इस शहर में घुम आया हँ। यहाँ घुमने से मुझे बहुत सुकुन मिलता है। खंडहरनुमा मस्जिदें, चर्च और अन्य धर्मों के पूजा स्थल से ज्यादा आकर्षित करते थे मुझे वह घर जो अजीब ही तरह की मिट्टी से बने होते थे और न मालूम वह कौन सी सुगंध थी जो भीतर घुसकर मेरी आत्मा तक को झकझोर देती थी।

पहली बार मैंने इस शहर के बारे में सन 89 में बाइबल में पढ़ा था। उसी के बाद से मैं इस शहर के इतिहास को खंगालने लगा। न मालूम क्यों मैं न जाकर भी इस शहर के प्रति आकर्षित हो गया। कई बार यह शहर मेरे सपनों में आया। मैं इस शहर की लगभग हर गली में घुम चुका हूँ। मैंने इस शहर में जिहादियों और क्रुसेडों को बहुत करीब से देखा है। मुझे एक ही चीज ज्यादा नजर आती थी दीवार पर लिखा वाक्य और बड़े-बड़े गुब्बदों पर बैठे पक्ष‍ी जो घोड़ों की टॉप सुनकर उड़ जाते थे।

शायद मैं यहीं के किसी कबिले में रहा हूँ। न मालूम क्यों वह पहाड़ और दूर से दिखाई देने वाला धूल का गुब्बार ऐसा लगता था मानो मैं कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हूँ लेकिन क्या? मालूम नहीं। इतना जानता हूँ की एक लम्बी सी सिल्ला पर बैठकर सोफिस्टों की बात सुन रहा हूँ जो कह रहे है कि 'ईश्वर हमारे बीच फुट डाल देगा, और सब कुछ नष्ट हो जायेगा।' यह सुनकर मैं डर जाता हूँ।

आओ जाने इस शहर को : येरुशलम (जेरुशलम) मुसलमानों, ईसाइयों और यहूदियों सभी के लिए पवित्र शहर माना जाता है। येरुशलम

मध्यपूर्व का एक बहुत प्राचीन नगर है, कहते हैं कि दसवीं शताब्दी ईसा पूर्व से येरुशलम, यहूदियों के लिए सबसे पवित्र और अध्यात्मिक स्थान रहा है। हीब्रू में लिखी बाइबिल में इस शहर का नाम 700 बार आता है। यहाँ यहूदियों के महत्वपूर्ण स्थल टैम्पल माउंट और पश्चिमी दीवार हैं।

यहूदी दुनिया में कहीं भी हों, येरुशलम की तरफ मुँह करके ही उपासना करते हैं, ईसाइयों के लिए भी यह शहर बहुत महत्व रखता है क्योंकि यह शहर ईसा मसीह के जीवन के अंतिम भाग का गवाह है। ईसाइयों का विश्वास है कि ईसा एक बार फिर येरुशलम आएँगे।

मुसलमान इसे तीसरा सबसे पवित्र स्थल मानते हैं, उनका विश्वास है कि यहीं से हजरत मोहम्मद जन्नत की तरफ गए थे और अल्लाह का आदेश लेकर पृथ्वी पर लौटे थे, येरुशलम की अल अक्सा मस्जिद और गुम्बदे सखरा मुसलमानों के पवित्र स्थल हैं, इस समय इस शहर में 1204 सिनेगॉग हैं, 158 गिरजे और 73 मस्जिदें, इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह शहर कितना महत्वपूर्ण है। यहूदी और ईसाई मानते है कि यही धरती का केंद्र है।

यहूदी, ईसाई और इस्लाम से पूर्व इस शहर की महक में बारूद और तलवार की गंध तो होती थी लेकिन वैसी नहीं जिससे पुरा शहर बेचेन हो उठता था। निश्चित ही यहाँ उस दौर में यूनानी और हिंदू देवताओं की पूजा का प्रचलन तो रहा ही होगा। यह भी की बौद्ध धर्म ने वहाँ तक अपने पर फैला रखे थे। आमीन। ओमीन। ओम। ओमकार।

प्रतिक्रियाएँ

Re: येरुशलम की याद
अनिरूद्ध, बहुत अच्छा लिखा आपने। यदि यह लेख पूरा ही आप अपने सपने में आए येरुशलम पर लिखते तो शायद और भी मार्मिक बन जाता क्यों अकसर इतिहास में जाने से कई बार बहुत ही बोझिल और अवांछित तथ्यों और आकंडों का भार उठाना पड़ता है इसके बरक्स कल्पना या कि साहित्य हमें ज्यादा संवेदनशील बने रहने के अवसर देता है। बहरहाल अच्छे लेख के लिए बधाई। इस आशा के साथ के नियमित लिखा करेंगे।
Re: येरुशलम की याद
आमीन। ओमीन। ओम। ओमकार। जिस दिन ये चारो शब्द हर इनसान की जुबाँ पर होंगे, कहीं से भी दंगे और विस्फोट की खबरें नहीं आएगी, कोई किसी गुलाबी नगरी को रक्तरंजित नहीं करेगा......
Re: येरुशलम की याद
सपनो के इस शहर की सैर कराने के लिए शुक्रिया, येरूशलम विश्व इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण पन्नो में से एक है जिस पर सभी धर्म-कौमों के ह्स्ताक्षर है|
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