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जून 2008


ब्लॉग्स (5)
यह हिंदूकुश पर्वत का वह दर्रा है जिससे निकल कर मैं न जाने कहाँ जा रहा हूँ। मेरे पास से गुजर रही है बौद्ध भिक्षुओं की एक कतार जो पीले गुलाबों-सी महक रही थी। उनके पास से चंदन की भी महक आ रही थी।इस दर्रें और इसके आस-पास जूनुनी गर्मी, ठंड और बरसात का अहसास ... आगे पढ़ें...

क्या सचमुच ही हूँ मैं इतना दयनीय कि अपने आप को ही लिखने लगूँ अपनी कविता में/ आगे पढ़ें...

मिट्टी चुप है पानी और हवा खफा है, मुझसे और आज सुबह ही मैंने बोये हैं....बीज/ आगे पढ़ें...