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चित हुआ चीता

सम्राट अशोक के काल के पूर्व सिंहली भी हिंदू हुआ करते थे। वैशाली की नगरवधू आम्रपाली, सम्राट अशोक, अशोक के पुत्र महेंद्र और बौद्ध भिक्षु संघमित्रा के प्रचार-प्रसार ने सिंहलियों को बुद्ध की शरण में ला दिया। इस काल से ही श्रीलंका भारत का ही हिस्सा हुआ करता था, जिसे दक्षिण जंबु‍द्वीप कहा जाता था।

पहले इतिहासकार मानते थे कि श्रीलंका के मूल निवासी सिंहलियों का संबंध भारत के दक्षिण भारतीय लोगों से ही है अर्थात पहले यह द्वीप उजाड़ पड़ा था और दक्षिण भारत के लोगों ने ही इसे आबाद किया फिर ताजा खुदाई से यह तथ्य उभरकर सामने आया की उत्तर भारतीयों ने ही श्रीलंका को बसाया था।

ऐसा माना जाता है कि सिंहल भाषा गुजराती और सिंधि से जुड़ी है। वर्तमान सिंहल भाषा ने स्वंय को पाली और संस्कृत से समृद्ध कर लिया है।

खैर जो भी हो श्रीलंका में जितने प्राचीन काल से सिंहली रहते आए हैं उतने ही समय से तमिल तटवर्ती इलाकों में रहते आए हैं। प्राचीन काल में श्रीलंका और तमिलनाडु के बीच कुछ ही मिनटों की दूरियाँ हुआ करती थी। वे दुरियाँ ऐसी थी कि जिससे दो राष्ट्रों के होने का आभास नहीं होता था। दोनों तरफ के लोग आसानी से आते-जाते थे और दोनों ही तरफ रहने के लिए किसी भी प्रकार की रोक-टोक नहीं हुआ करती थी।

धीरे-धीरे भुगोल बदला और राजनीतिक हालात भी बदलते गए। दो भूमियों के बीच विशाल समुद्र ने दो राष्ट्रों को जन्म दिया। मुगल काल और ब्रिटिश काल की शुरुआत तक श्रीलंका, बर्मा और अफगानिस्तान को अखंड भारत का हिस्सा ही माना जाता रहा, लेकिन इस्लामिक शासन और फिर ब्रिटिश शासन ने कब इन्हें अलग कर दिया इसके बारे में भारत की जनता को कभी मालूम नहीं हुआ।

होगा भी कैसे, क्योंकि उस काल में पूरे एशिया में संपर्क और संचार के कोई साधन नहीं थे और न ही भारत की जनता राजनीतिक रूप से जाग्रत थी। सोचो कितनों को मालूम था कि भारत का नक्क्षा कैसा है? आज भी जो नक्क्षा बताया जाता है वह हकीकत नहीं है। तब ऐसे में जनता को जो समझा दिया जाय वही मान लेती थी। 900 साल की गुलामी से इस बात का अहसास भी जाता रहता है कि हम गुलाम हैं। खैर।

भोले और राजनीति से अनजान ‍तमिलों और सिंहलियों को यह नहीं पता था कि ब्रिटिश सरकार हमारे साथ क्या खेल-खेल रही है ठीक उसी तरह जिस तरह की भारत में हिंदू और मुसलमानों के बीच फसाद का खेल खेला जा रहा था।

सिंहली समुदाय को अपना प्रतिद्वंद्वी समझने वाले तमिलों ने श्रीलंका में अलग तमिल राज्य की माँग को लेकर जो हिंसक आंदोलन छेड़ा उसके पीछे दोनों ही समुदायों के बीच नफरत का बारूद भरा था ब्रिटिशों ने। इस बारूद ने 26 साल के संघर्ष में 70 हजार से ज्यादा लोगों की जान ले ली।

क्यों भरा बारूद : हालाँकि यह डच, पुर्चगाली और फ्रांसिसियों सभी ने थोड़े-थोड़े काल तक तटवर्ती इलाकों में राज किया फिर भी ब्रिटिशों का शासन ही ज्यादा रहा।

ब्रिटिशों ने जहाँ भी शासन किया वहाँ एक विशेष रणनीति के तहत 'बाँटों और राज करो' की नीति अपनाई। इसका पहला फायदा यह कि हमारे पास राज को कायम करने के लिए किसी एक पक्ष का भरपूर समर्थन मिलता रहेगा और दूसरा फायदा यह कि राज खतम भी हो जाता है तो यह खुद ही आपस में लड़-झगड़कर प्रगतिहीन बने रहेंगे, जिससे हमारे प्रति दुश्मनी का भाव इनमें कभी नहीं पनपेगा और ना ही ये लोग कभी हमसे ज्यादा शक्तिशाली बन पाएँगे।

अब जब लिट्टे का खात्मा हो ही गया है और निश्चित तौर पर राजीव गाँधी का हत्यारा प्रभाकरण मारा गया है तो चिंता इस बात की होना चाहिए कि श्रीलंका सरकार तमिलों के पुनर्वास और तमिलों को बराबरी का जर्दा देने के प्रति कितनी चिंतित है।

भारत के तमिलनाडु में पिछले कई वर्षों से श्रीलंकाई ‍तमिल नागरिक शरण लिए हुए है और श्रीलंका के तमिल इलाकों में तमिल जनता तीसरे दर्जे का जीवन जीने के लिए मजबूर है। कहीं ऐसा न हो कि इन गरीबों को फिर से कोई राजनीतिक संगठन या दुश्मन देश हथियार न थमा दें।- क्रमश:
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